क्यूँकि यही बिकता है। 

किसी ने कहा , तुम लड़की हो,

छोड़ो ये  वीर रस की कविताएँ।

वीर रस तो पुरुष लिखा करते हैं।

स्त्री द्वारा लिखित वीर रस की कविता कोई नहीं पढ़ेगा।

क्योंकि संघर्ष तो सिर्फ पुरुषों का होता है।

स्त्री तो घर की चार दीवारी की वस्तु  है , उसका क्या संघर्ष ?

लिखना ही है तो मिलन की पहली रात्रि लिखो,

अभी प्रेम की उम्र है तुम्हारी।

अपने प्रेमी के पहले स्पर्श की अनुभूति लिखो।

क्यूँकि यही बिकता है।

 

तो क्या मै ये समझूँ की , संसार स्त्री द्वारा रचित किसी भी रचना को ,

सिर्फ भोग और विलास की वस्तु के रूप में ही देखना चाहता है?

क्यूँकि यही बिकता है।।

 

नारी !

नारी हूँ मैं , कोई अबला नहीं। 

जीवन को अपनी कोख में संभालने  का साहस हूँ मैं  

नहीं राम की सीता मैं , बल्कि उसके हुए अपमान का प्रतिघात  हूँ मैं।  

घूँघट नहीं , एक स्वछन्द विचार हूँ मैं।  

तुम्हारी भोग की  वस्तु नहीं , जीवन चक्र चलाने की  शक्ति हूँ मैं।  

 

कह दो तुलसी दास से , उनके समय से आगे का विचार हूँ मैं।  

कोई अबला नहीं , देश  के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाली वीरांगना हूँ मैं. 

प्रेमी के अधरों का अनुराग नहीं , बल्कि प्रेम के लिए खुद को जौहर  कर देने वाली मर्यादा हूँ मैं। 

नारी हूँ मैं , कोई अबला नहीं। 

 

हाँ  दिया है प्रभु ने तुम्हे बाहुबल , पर क्या सहशीलता भी दी है तुम्हे ? 

सदियों से खुद की इच्छाओं को मार कर , सदैव दूसरों के लिए जीना का सहस भी दिया है तुम्हे ? 

 

क्या कहूं की गौतम  बुद्ध  की नहीं , बल्कि राहुल का आँचल हूँ मैं 

नारी हूँ मैं , कोई अबला नहीं।

 

 

Khwahishen!!

Khwahishen hi Khwahishen hain, anginat Khwahishen hain.

janati hun inka koi ant nahi, sab jhuti Khwahishen hain.

Par fir bhi din-raat tumhari hi Khwahishen hain.

 

Khwahish hai ki iss chandani raat me bas tumhara sath ho,

Tumhare kandhe par sir rakh kar do pal ko mai bhi susta lun.

Bht hui veer ras aur balidaan ki baatein, abb thoda prem geet gane ki Khwahishen hain.

Duniye ke bhog-vilaas se dur abb tumhara daaman thamne ki Khwahishen hain.

 

Aur tabhi hava ka ek jhonka mujhe sehlate hue nikalta hai aur need khul jati hai meri.

Aankhe michti hui uthti hu mai, aur muskurati hun,  ki sab jhuti hain ye Khwahishen.

You & Me!!

You & Me, smiling at each other.

You & Me, talking to each other.

You & Me, missing each other.

You & Me, different than this world.

You & Me, tied with an invisible bond.

You & Me, beyond the rules of this world.

You & Me, beyond the web of good and bad of this world.

When you smile at me and the entire world comes on my feet.

When I held you in my arms the very first time..

and your tiny little fingers touched me.

When you opened your little eyes, the entire world stopped around me.

When you hug me and read my heart without uttering a single word,

that’s the only thing that I wanted in this world.

You & Me,

beyond the definition and explanation.

Only You & Me…Rafa!!

(dedicated to my nephew #Rafa)

Knock Knock!!

Knock, Knock!!

Life! Are you still there?

Are you still inside me?

Ahh! I can hear your breath.

Hahahaha!!

Thanks, that you waited for me.

I thought you won’t wait for me

As, yesterday night, I was so annoyed with you..

but thank you so much, that you did not leave me.

Thanks for holding my hand every time whenever I was trying to leave you.

धर्म

धर्म.  … क्या परिभाषा है इसकी ? .. 

जी ये न कहियेगा की धर्म , “सर्व धर्म  सम्भाव  है.   …”

अजी वो तो बीते ज़माने की परिभाषा  हुई , जब कबीर और रहीम ने कृष्ण के प्रेम में दोहे लिखे। 

अब तो धर्म की परिभाषा नई है , और हो भी क्यों ना। …

आख़िर ज़माना बदल रहा है तो धर्म की परिभाषा भी बदलनी चाहिए।   

 

तो क्या है धर्म की नई परिभाषा ?

धर्म वो है जो हमें , “सिर्फ हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं ” सिखाता है।   

धर्म वो है जो हमें , निर्दोषों का ख़ून बहाना सिखाता है. …

धर्म वो है जो हमें,  पुरे विश्व में सिर्फ हमे ही राज करना है सिखाता है। 

धर्म ! जो  कहता है , जो अपने धर्म का नहीं उसे  जीने का कोई अधिकार नहीं।  

धर्म जो हमें मासूम बच्चों  से उनकी हसीं छीन कर उन्हें भी धर्म के नाम पर  दूसरों का ख़ून बहाना सिखाता है।   

 

ये है धर्म …… और उसकी नई  परिभाषा.  …..

वैसे परिवर्तन संसार का नियम है। . . तो धर्म के नाम पर  ये परिवर्तन भी स्वाभाविक ही होना चाहिए।  

परन्तु फ़िर भी पता नहीं क्यों,  धार्मिक प्रवित्ति की होने के बाद भी धर्म की ये नई परिभाषा समझने में असमर्थ हूँ मैं।  

सजीला शहर : बनारस !

सजीला शहर : बनारस !

गंगा का किनारा: बनारस । 

घाटों की माला: बनारस ।

सर्व विद्या की राजधानी : बनारस।  

 

जिसने दिए गिरिजा देवी और बिस्मिल्लाह खान जैसे शिरोमणि, वो शहर बनारस ।  

दशाववमेध पर मुंडन, हरिश्चन्त्र पर अंत्येष्टि: वो शहर बनारस ! 

अस्सी की सुबह-इ-बनारस की संगोष्ठियां , और गंगा की रेती पर चित्रकारों की लगन और निष्ठा का शहर बनारस।  

 

कवियों और उपन्यासकारों की नगरी बनारस। 

पर विदेशियों के लिए… अब भी एक पहेली बनारस।  

फागुन का  रंगीला शहर बनारस। 

शिव के भक्तों का अल्लड़पन  बनारस।  

संस्कारों की नगरी बनारस। 

एक स्वछन्द विचार बनारस, एक सजीला शहर बनारस ! ! 

 

 

 

शिव !

शिव को पाना जितना कठिन है ,

उतना ही सरल है शिव को समझना।

शिव एक मात्रा लिंग।

शिव एक मात्रा ओंकार।

शिव एक मात्रा  ब्रम्हाण्ड  ध्वनि।

शिव हर परिस्तिथि  में भी  तटस्थ  भाव।

शिव एक मात्रा ध्यान।

शिव एक मात्रा योग।

He Prabhu! Kaise Likhun!!

Kaise likhun ki, shabd nahi hain mere paas.

Kaise likhun ki, jab aap ka hasta chehra dekhti hu to baki sab bhul jati hun.

Kaise likhun ki, aap ke iss athah prem ko kaise sametu yahi sochti hu.

Kaise likhun ki, Prem ka maarmic artha mujhe abb samajh aaya.

Ki Prem vo hai jo aap ne kiya, ki hamare liye apne shareer ko hi gala diya.

Kaise likhun ki, sochti hu ki, ye kyu samabhav nahi ho pa raha mere liye,

Ki khud ka shareer gala kar aapko punah paa lu!

Kaise likhun ki, ye bheege kagaz bhi sambhal nahi pa rahe inn jhanjhvaaton ko!

Kaise likhun ki, har phaagun aur diwali sune ho gaye hain abb.

kaise likhun ki, aap ka sath paane ki iss hodd me jeet sirf meri hi ho, ye ek aakhri ichha hai meri!

Kaise likhun ki, meri aankhe khulne se le kar band hone tak bas aap ko hi dekhu ye hi ichha hai abb.

Kaise likhun ki, bht kch unkaha reh gaya hamare beech.

kaise likhun ki, bachpan me aapne aur maa ne dur kiya mujhe khud se, par abb na dur hone ki ichha hai meri.

kaise likhun ki, apne har akshamya apradh ke liye kshama maangti hu mai aapse,

Kyunki aapne har baar apne anant prem ki jaladhi me mere har apradh ko kshama kiya hai.

kaise likhun ki, abb ye mann aandhvishwaso me pad kar bhi aap ko pa lene ki zid karta hai.

Kaise likhun ki, abb mai vo manzar dubara nahi dekh sakti, jahan aap jeevan aur apne shareer se sangharshrat hon!

He Prabhu! Kaise Likhun!!