कुछ सीख पाएंगे हम या फिर वही पुराने रंग दिखाएंगे हम !

सोचती हूँ क्या लिखुँ , इस COVID पर ,

इतना कुछ पहले ही लिखा जा चुका  है इसपे।

 

घरों में रहिये , दुरी बनाये रखिये।

साफ़ सफाई रखिये, और सुरक्षित रहिये।

 

पर इस COVID ने जो हमें सीखा दिया ,

क्या वो हम कभी बिना इस एक सूक्ष्म वायरस के समझ पाते ?

कदापि नहीं।

 

हमने तो मानव जाती को ही सर्व श्रेष्ठ मान लिया था।

हम जैसे चाहे , इस पृथ्वी , गगन और अंतरिक्ष को मोड़ सकते हैं , मान लिया था।

 

पर वास्तविकता तो कुछ और ही निकली,

जब सिर्फ एक वायरस ने हमारी परिस्तिथि बदल दी।

जिससे हर टेक्नोलॉजी होने के बाद भी हम अब तक जूझ रहे हैं।

 

सिर्फ एक वायरस ने हमें  घर की चार दीवारी में कैद कर दिया है।

अब शायद मनुष्यों के लिए ये समझ पाना आसान होगा की ,

पशुओं को पिंजरे में कैद होकर कैसे लगता है !!

 

परन्तु विस्मय नहीं कोई इसमें ,

की ढाक के तीन पात हो जायेंगे हम।

और फिर वही पुराने रंग दिखाएंगे हम !!

 

 

 

 

नाम हूँ मैं !!

क्या हुआ जो तुमने कहा, नहीं बन  सकती  मैं आत्म -निर्भर ,
पर खुद को भीड़ से अलग , स्वावलम्बी बना लेने का नाम हूँ मैं !
 सदियों तक रौंदा तुमने , मेरे आत्मा-सम्मान को ,
पर इस समाज की भट्टी में जल कर,
कुंदन बन आने का नाम हूँ मैं !
 कहा किसी ने मुझे , की नहीं हैं ,
कुछ पा लेने की हस्त -रेखाएं मेरी  हथेलियों  में !
उन  रेखाओं को हथेलियों से छील कर ,
आगे बढ़ आने का नाम हूँ मैं !
क्या हुआ जो तुमने कहा , वो आग नहीं मुझमे ,
पर सूरज की लौ लिए , सब कुछ जला देने और ,
सब कुछ बना देने , का  नाम हूँ मैं !
कुछ वक़्त तुम्हारा था , और  कुछ मेरा ना था ,
 पर वक़्त पे अपना नाम लिख आने का,
नाम हूँ मैं !!

उड़ने की चाह !!

उड़ने की चाह है ,
इस सिंदूरी शाम को, अपने अंको में भर लेने की चाह  है !
उड़ने की चाह है !
इस अविरल आसमान में , पक्षियों संग अनवरत  उड़ने की चाह  है.
इस शून्य अंतरिक्ष को , अपने पंखों से नाप लेने की चाह  है। 
उड़ने की चाह है ,
बांध  सके ना कोई मुझे भरण – पोषण के बंधनो में ,
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !
ये घना  अँधेरा , रात्रि के पहर का  भी,
रोक ना  पाए मुझे , इस संध्या सखी को अपने अंको  में बांधने  से  
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !
 कभी ना  रुकू, ना  कभी थकूं ,
इस साँझ को निहारते ,
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !

हिंदुत्व के पहरेदार !

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये ,

हर बात पर हर हर महादेव बोल कर दूसरों का सर धड़ से अलग करने वाले ,

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये !

 

दूसरे देश के लोगो को निक्कम्मा कह ,

खुद बेवजह दूसरों को परेशान करने वाले ,

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये !

 

शिवरात्रि, होली और दुर्गा अष्टमी जैसे पावन पर्वों पर ,

अश्लील और  फूहड़ गानों पर नंगे नाचने वाले,

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये !

 

लड़कियां क्या करने और नहीं करने से,

अगले जन्म में कुत्रियाँ बनेंगी, तय करने वाले,

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये !

 

दूसरे देश से आये लोगों के साथ अभद्रता कर ,

हिंदुत्व का नाम रोशन करने वाले ,

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये !

 

भूल गए ये की इनके गुरु स्वामी विवेकानंद ने कहा था ,

“हिंदुत्व कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है ”

 

भूल गए ये अटल की वाणी,

“कब घर घर को हिन्दू करने, हिन्दू ने नरसंघार किये ?”

 

हिंदुत्व के पहरेदार हैं ये !!

 

बनारसी रंग

बनारसी रंग है ये।

कुछ ढीठ, कुछ अल्हड़।

कुछ ठेठ, कुछ गंभीर।

कुछ विश्वास, कुछ बचपना।

कुछ सच, कुछ भौकाल।

कुछ संस्कार, कुछ अपनापन।

पर जैसे भी है सब पर चढ़ ही जाता है ये रंग।

बनारसी रंग है ये, नहीं उतरने वाला अब ये।

 

निःशब्द !

आज कोई चेहरा दिखा , उम्र के कई पड़ाव पार किये हुए।

जिल्द सिकुड़ सी गई थी उसकी।

और पेट पलने के लिए कांपते हाथों से काम किये जा रहा था वो.

जब गौर से देखा उस चेहरे की तरफ तो लगा ऐसे ही किसी चेहरे के साथ बचपन बिताया था मैंने अपना ।

धुंधले चश्मे और कांपती आवाज़ में बोला उन्होंने , बेटा क्या लोगे?

और निःशब्द खड़ी रही मै।

तभी अचानक अपने हिस्से का आम भी मुझे दे दिया, कह कर की ये ज़्यादा मीठे हैं |

और तब भी निःशब्द ही रही मै !

किवाड़ !

बहुत दिनों से बंद थी किवाड़।

आज अचानक ही लगा की देखूँ ज़रा बाहर।

कुछ धुंधली सी थी किवाड़।

खींच के खोलने की कोशिश की तो पाया की एक नहीं दो किवाड़ थी वहाँ।

पहले को खोला तो आसमान थोड़ा साफ़ नज़र आया.

और हिम्मत करके जब दूसरे को खोला तो ठंडी हवा का झोंका पुरे कमरे में भर गया,

जैसे वो वो बस किवाड़ खुलने  के इंतज़ार में ही था.

पर इस मन की किवाड़ को कैसे खोलूं जहा एक या दो नहीं बल्कि अनगिनत किवाड़ हैं,

जो खींच के खुलने वाले नहीं।

और बस इसी अनमने भाव से दुबारा बंद कर दी मैंने किवाड़!!

एकांत

एकांत ! बहुत ढूंढा तुम्हे , बहुत याद किया !

तुम्हारा ये छुपन छुपाई का खेल बहुत लंबा चला। 

पर आखिर आमना  सामना हो ही गया हमारा। 

अब् जब तुम मिले हो तो मुस्कान अधरों पर  टिक सी गई है।  

न जाने क्यों तुम्हारे साथ में एक सुकून है, जो और कहीं नहीं।

एक तुम हो और एक ये हल्की धुप है माथे पे ,

और वही शहर , और भी ज़्यादा सुन्दर लगने  लगा है। 

तुम्हारे साथ में, इस मशीन और पहियों के शोर में भी चिड़ियों की चहचहाहट और 

पत्तों के ऊपर से गुज़रती  हवा की  आवाज़  सुनाई दे रही  है मुझे।

कितना कठिन था हर वक़्त भीड़ में घिरे रहना !

शरीर थक सा गया है बहुत, पर कुछ तो है तुम्हारे साथ मे की मन अब भी उन्माद में है। 

 

एकांत !

क्या ये पल ठहर जायेगा यु ही तुम्हारे साथ में , जैसे पल रुक जाते हैं तस्वीरों में ?

या की फिर तुम भी चंचल हो स्वाभाव में, और तुम्हारा ये लुका छिपी का खेल फिर से चलेगा !!

 

 

 

 

 

क्यूँकि यही बिकता है। 

किसी ने कहा , तुम लड़की हो,

छोड़ो ये  वीर रस की कविताएँ।

वीर रस तो पुरुष लिखा करते हैं।

स्त्री द्वारा लिखित वीर रस की कविता कोई नहीं पढ़ेगा।

क्योंकि संघर्ष तो सिर्फ पुरुषों का होता है।

स्त्री तो घर की चार दीवारी की वस्तु  है , उसका क्या संघर्ष ?

लिखना ही है तो मिलन की पहली रात्रि लिखो,

अभी प्रेम की उम्र है तुम्हारी।

अपने प्रेमी के पहले स्पर्श की अनुभूति लिखो।

क्यूँकि यही बिकता है।

 

तो क्या मै ये समझूँ की , संसार स्त्री द्वारा रचित किसी भी रचना को ,

सिर्फ भोग और विलास की वस्तु के रूप में ही देखना चाहता है?

क्यूँकि यही बिकता है।।