तो भी कम है|

मैं जितना भी तुम्हें देखूँ , कम है।

मैं जितना भी तुम्हें निहारूं , कम है।

मैं ख़ुद को भी भूल जाऊँ तुममें , तो कम है।

मैं रोज़ तुम्हारे लिए सजूं , तो भी कम है।

मैं रोज़ शाम , चौखट पर इंतज़ार करूँ तुम्हारा तो भी कम है।

मैं कितना भी इश्क़ करूँ तुमसे , कम है।

हर रोज़ बादलों के पीछे ढूंढूं तुम्हे ,

तुम्हारे इतने रंगों में से किसी रंग में खो जाऊँ मैं , तो भी कम है।

कभी क्षय न हो चांदनी तुम्हारी , व्रत -उपवास करूँ मैं ,

तुम्हे ही अपना प्रिय बनाऊं , वो भी कम है।

मैं हर रोज़ निहारूं तुम्हें, तो भी कम है।

माँ के लिए, मैं फिर आऊँगी!

अगर कभी मैं घर वापस ना आ पाऊं ,

अगर कभी मेरी लाश या अधजलि लाश तुम तक पहुंचे ,

अगर कभी मेरे शरीर के टुकड़े कूड़े के ढ़ेर या नाले में पड़े मिले ,

जब कभी तुम्हारी कोख और मेरी मौत की कीमत लगायी जाये।

एक भी आंसू ना बहाना तुम।

चीथड़े कर दिए गए मेरे शरीर का, शोक मत मनाना तुम ,

धीरज रखना और मेरा इंतज़ार करना तुम।

क्यूंकि ये शरीर जला है , मेरी आत्मा नहीं।

मैं फिर आऊँगी , मैं तब तक आऊँगी,

जब तक मैं काली बन अपने बहे हर ख़ून की बूँद का बदला, इनका रक्त-पान कर ना ले लूँ।

मैं तब तक आऊँगी,

जब तक मैं परशुराम का क्रोध बन अपनी कुल्हाड़ी से इनका सिर धड़ से अलग ना कर दूँ ,

मैं तब तक आऊँगी,

माँ ! मैं फिर आऊँगी।

धीरज रखना, और मेरा इंतज़ार करना तुम।

ऐसे देश में !

जिस देश की सरकार राममंदिर बनवाने और स्टेशनों का नाम बदलने में करोड़ो ख़र्च करने में व्यस्त हो ,

जिस देश की जनता Rape, Molestation, Moral-Policing and Eve-Teasing में व्यस्त हो,

जहाँ पुलिस जनता की सुरक्षा करने के बजाय केस की लीपा-पोती में व्यस्त हो ,

जहाँ के न्यायाधीश के शब्द हों ” Rape is a natural urge in Men”.

वह देश मेरा नहीं,

ऐसे देश में , ऐसे शहर में, बेटियों का जन्म लेना भी दुखद है !

SUNSHINE BLOGGER AWARD !

Namaskar to All!! I am really grateful to Asif for Nominating me for SUNSHINE BLOGGER AWARD.

Asif’s Blogs are really impressive and contains a lot of information. Please check out his posts here and like, share and follow at: https://careersinformetionandmotivetion.business.blog/author/asifmotivationandknowledge/

A Special Thank you to WordPress and Asif for this nomination!

Rules

(1) Thank the blogger who nominated you in the blog post and link back to their blog

(2) Answer all 11 questions the blogger asked you.

( 3) Nominate 11 new bloggers to receive the award and write them 11 new questions.

(4) List the rules and display the sunshine blogger Award logo in your post and /or on your blog.

Questions by Asif and my answers:

(1) Why you start blog :

I was going through many ups and downs in my life and my close friend suggested that the energy which I am investing in sulking is the same energy which I can turn into a positive direction.


( 2) How preparation before blog?:

Honestly I write when I feel writing so I do not give any special preparation for this.


(3) How enjoy your happy moments?:

I enjoy by writing.


( 4) Do you remember your childhood favourite dish?

It’s none other than the Sweet Dish “Gulab Jamun”.


(5) What is expect your viewrs ?

I am always gratefull to all my viewers for their time.


(6) Choose one auther or acter ?

I will choose my all-time favorite author: “Mahadevi Verma”.


(7) Whear are you live ?

Varanasi


(8) What is your original full name ?

Sandhya Pandey


(9) Do you like book reading ?

Yes, I do.


(10) Your favorite place for holiday ?:

It is and will always be Varanasi


( 11) Your memorable trip with your family ?

Yercaud in Tamil Nadu.

THANK YOU AGAIN Asif!

My question for my nominees:

  1. How will you define yourself?
  2. What is your inspiration for blogs?
  3. Why you started blogging?
  4. Who is your favourite Blogger?
  5. How much time do you spend on blogging?
  6. Are you a full-time Blogger?
  7. What are the issues you are facing in Blogging.
  8. How you felt when you shared your first Blog?
  9. What are your expectations from your readers?
  10. How do you see the future of bloggers?
  11. How do you prepare that you do for your blogs?

Below are my Nominees:

  1. Dinbandhu Dinanath: https://aapkekisse.in/
  2. Anam Gaur: https://homein.home.blog/
  3. Garima: https://justletsdosomeawesome.wordpress.com/
  4. Parma Kumar: https://thehindimail.wordpress.com/
  5. Shanky: https://ashish05shanky.wordpress.com/
  6. Aradhana: https://wordsofsoul.art.blog/
  7. Rishabh: https://myjoopress.wordpress.com/
  8. Shivani: https://shivanisingh861762109.wordpress.com/
  9. Shree Nidhi: https://truthreveal.art.blog/
  10. Dr. Garima Tyagi: https://garimadr03com.wordpress.com/
  11. Tara Pant: https://tarapant.com/

एक हिस्सा धूप

एक हिस्सा धूप , ऊर्जा के स्रोत का है।

एक हिस्सा धूप , संघर्ष का है।

एक हिस्सा धूप , नवांकुर का है।

अनगिनत रश्मियों से परिपूर्ण ये एक हिस्सा धूप , सृजन का है।

एक हिस्सा धूप , पतझड़ का भी है।

तो ये एक हिस्सा धूप, गलन को पिघला देने का भी है।

एक हिस्सा धूप, कालचक्र का भी है।

रश्मिरथी पे सवार ये एक हिस्सा धूप, कार्यों के निर्वाहन का भी है।

एक हिस्सा धूप, तमस के अंत का है।

एक हिस्सा धूप, अंतःकरण में विलीन होने का है।

एक हिस्सा धूप, तुम्हारा भी है।

ये एक हिस्सा धूप, मेरा भी है।

मसला

मसला टूटी सड़कों का है , गड्ढों में भरे बारिश के पानी का है।

मसला इस मूसलाधार बारिश में मिटटी के घरों के ढह जाने का है।

मसला ……… खुले मैनहोल और आय -दिन उसमे गिर के अपनी जान गवाने वालों का है।

अमीरों को अपने देश से बाहर भागने का मसला है !

तो बच्चों को किताबों के बोझ का मसला है,

और फिर टीचरों को TET एग्जाम पास करने का मसला भी है … !

इधर नौकरीपेशा को बढ़ते खर्चों का मसला है तो ,

उधर गरीब को डायन महंगाई का मसला है ।

और सरकारों को ….. अपनी कुर्सी बचाने का मसला है।

मसला ये भी है की वो क्या चाहते हैं ,

मसला ये भी है की हम क्या चाहते हैं ?

तो किसी के मर्म को समझना भी एक मसला है।

सरकारें आईं और गईं पर मसला वहीँ का वहीँ ,

किसी का कुछ मसला , तो किसी का कुछ ,

पर इन् मसलों को हल करना भी एक मसला है।

मुददतों बाद।

मुददतों बाद, आवाज़ सुनी उसकी।

मुददतों बाद, ठहर गया लम्हा वहीं ।

मुददतों बाद, फिर एक लम्बी ख़ामोशी थी , हम- दोनों के दरमियाँ।

मुददतों बाद!

मुददतों बाद, इन् खामोशियों में अपना नाम सुना मैंने ,

मुददतों बाद, लगा की ज़ोर से पुकारूँ उसका नाम, और इन् बादलों को चीरती मेरी आवाज़ मीलों दूर……… उस तक पहुँच जाये।

मुददतों बाद, लगा की फिर गले लगा लूँ उसे , की पता नहीं फिर मुलाकात हो न हो !

मुददतों बाद!

मुददतों बाद, फिर पता चला की कोरा सपना ही था ये।

मुददतों बाद, फिर से सिर्फ़ सपना ही था ये!!

मजदूर !

मजदूर हूँ मैं , और क्या पहचान है मेरी तुम्हारे लिए ?

तुम्हारे हाथ की कठपुतली हूँ मैं।

 

लोकतंत्र के तिलकधारियों ,

तुम्हारे वोट बैंक को हमने भरा 

और जब हमारी मदद करने की बारी आई तो ,

तुमने हमें सड़कों पर , रेलगाड़ियों के निचे और हमारे अजन्मे बच्चे को नालियों में मरने के लिए छोड़ दिया ??

इससे ज़्यादा ध्यान तो हम हमारे भेड़ -बकरियों का रखते हैं। 

 

अब् तुम्हारे इन् रहत पैकेजों का क्या करें हम जब हमारे अपने ही हमारे बीच  नहीं रहे। ..!

जो निकले थे अपने घरों की तलाश में , उन्हें क्या पता था 

की दिनों तक भूखे -प्यासे चिलचिलाती धुप में चलते रहने के बाद ,

एक दिन इन्हीं राहों में, पैरों में छाले और आँखों में घर तक जाने की इच्छा लिए वो आखरी साँस लेंगे। ..

 

क्या तुम्हारे टीवी पर किये खोखले भाषण और झूठे वादे , ज़िंदा कर पाएंगे उन्हें ?

क्या भेज पाएंगे उन्हें घर जहा अब भी कोई भीगी आँखों से उनका इंतज़ार कर रहा है। ..

जहाँ अब तक चूल्हा नहीं जला क्यूंकि , जो निकले थे घर से की घर का चूल्हा जलता रहे , अब् कभी घर वापस नहीं जा सकेंगे। .

 

क्या ये लोकतंत्र के तानाशाह वापस ला पाएंगे ?

उस अजन्मे बच्चे को जो इस दुनिया में आने से पहले ही आप की तानाशाही की भेट चढ़ गया?

क्या कम कर सकेंगे उस माँ का दुःख जिसकी  गोद भरते ही सुनी हो गई??

विदेशों में विमान भेजने की सुविधा देने वाले , अपने ही देश में बसें भी नहीं चला सकते थे ??

विदेशियों से ज़्यादा खतरा तो हमें अंदरूनी दुश्मनो से है।  

 

पर अबकी बार भी चुनाव होंगे और फिर  आएंगे आप  गिड़गिड़ाते हुए हमारे सामने झोली फैलाये। .

तब पूछूंगा मैं , एक चुनाव के प्यादे से ज़्यादा क्या पहचान है मेरी आपके लिए ??

 

 

“ख़ैर किसी भी तरह की ऊँची सोच राजनेताओं से अनअपेक्षित ही है , परन्तु इन् सभी सवालों के लिए राजनेता उत्तरदाई तो अवश्य ही हैं !”

 

 

मैं इश्क़ लिख रही हूँ !

 

मैं इश्क़ लिख रही हूँ , मैं तुम्हे लिख रही हूँ !

बनारस !!

 

तुम्हारी वो लचकती गलियाँ ,

तुम्हारा वो अल्हड़पन !

तुम्हारी वो सशक्त सीढियाँ ,

तुम्हारी वो रूहानी शाम का ढलना। 

 

मैं  वो सब लिख रही हूँ, मैं… इश्क़ लिख रही हूँ। ………!

 

की तुम्हारे  वो निश्छल घाट ,

तुम्हारे वो लज़ीज़ पकवान !

तुम्हारी वो रंगीली होली की शाम,

और तुम्हारा वो दिवाली का श्रृंगार !

 

मैं  सब लिख रही हूँ, मैं तुम्हे लिख रही हूँ !

 

तुम्हारी वो गंगा-जमुनी तहज़ीब।  

तुम्हारी  वो सुबह -ए बनारस की  महफिलें।   

तुम्हारा वो साड़ियों में बनारसी विरासत को बुनना।

तुम्हारा वो जीवन-मरण को इस समान देखना।

  

तुम्हारा  वो अपनापन, मैं  सब लिख रही हूँ, 

मैं इश्क़  लिख रही हूँ, मैं तुम्हे  लिख रही हूँ !!

 

 

 

 

 

ये हसीं !!

ये हसीं !

जो सम्बल देती है।

ये हसीं !

जो बार बार याद दिलाती है नहीं भुलाया आपने मुझे ,

की वही आपके शब्द दोहराती है ,

” बेटा आँखें पोछो , तुम सब संभाल  लोगी ”

 

ये हसीं !

एक बार फिर जीवन देती है।