तो भी कम है|

मैं जितना भी तुम्हें देखूँ , कम है।

मैं जितना भी तुम्हें निहारूं , कम है।

मैं ख़ुद को भी भूल जाऊँ तुममें , तो कम है।

मैं रोज़ तुम्हारे लिए सजूं , तो भी कम है।

मैं रोज़ शाम , चौखट पर इंतज़ार करूँ तुम्हारा तो भी कम है।

मैं कितना भी इश्क़ करूँ तुमसे , कम है।

हर रोज़ बादलों के पीछे ढूंढूं तुम्हे ,

तुम्हारे इतने रंगों में से किसी रंग में खो जाऊँ मैं , तो भी कम है।

कभी क्षय न हो चांदनी तुम्हारी , व्रत -उपवास करूँ मैं ,

तुम्हे ही अपना प्रिय बनाऊं , वो भी कम है।

मैं हर रोज़ निहारूं तुम्हें, तो भी कम है।

2 thoughts on “तो भी कम है|

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