उड़ने की चाह !!

उड़ने की चाह है ,
इस सिंदूरी शाम को, अपने अंको में भर लेने की चाह  है !
उड़ने की चाह है !
इस अविरल आसमान में , पक्षियों संग अनवरत  उड़ने की चाह  है.
इस शून्य अंतरिक्ष को , अपने पंखों से नाप लेने की चाह  है। 
उड़ने की चाह है ,
बांध  सके ना कोई मुझे भरण – पोषण के बंधनो में ,
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !
ये घना  अँधेरा , रात्रि के पहर का  भी,
रोक ना  पाए मुझे , इस संध्या सखी को अपने अंको  में बांधने  से  
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !
 कभी ना  रुकू, ना  कभी थकूं ,
इस साँझ को निहारते ,
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !

4 thoughts on “उड़ने की चाह !!

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