नारी !

नारी हूँ मैं , कोई अबला नहीं। 

जीवन को अपनी कोख में संभालने  का साहस हूँ मैं  

नहीं राम की सीता मैं , बल्कि उसके हुए अपमान का प्रतिघात  हूँ मैं।  

घूँघट नहीं , एक स्वछन्द विचार हूँ मैं।  

तुम्हारी भोग की  वस्तु नहीं , जीवन चक्र चलाने की  शक्ति हूँ मैं।  

 

कह दो तुलसी दास से , उनके समय से आगे का विचार हूँ मैं।  

कोई अबला नहीं , देश  के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाली वीरांगना हूँ मैं. 

प्रेमी के अधरों का अनुराग नहीं , बल्कि प्रेम के लिए खुद को जौहर  कर देने वाली मर्यादा हूँ मैं। 

नारी हूँ मैं , कोई अबला नहीं। 

 

हाँ  दिया है प्रभु ने तुम्हे बाहुबल , पर क्या सहशीलता भी दी है तुम्हे ? 

सदियों से खुद की इच्छाओं को मार कर , सदैव दूसरों के लिए जीना का सहस भी दिया है तुम्हे ? 

 

क्या कहूं की गौतम  बुद्ध  की नहीं , बल्कि राहुल का आँचल हूँ मैं 

नारी हूँ मैं , कोई अबला नहीं।

 

 

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